अध्यात्म क्या है ?

अध्यात्म क्या है ? इस विषय पर महापुरुषों ने समय समय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं ! पर मूल रूप से इस पर विचार करें तो अध्यात्म से तात्पर्य है – “आत्मा से सम्बंधित” और इसका विषय है “आत्मा को जानना”

गीता में अर्जुन प्रश्न करता है –

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥

अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं॥

भगवान श्री कृष्ण उत्तर देते हैं –

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।8.3।।

परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरुप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है वह कर्म नाम से कहा गया है !  

! कबीर के शब्दों में कहें तो –

आतम ज्ञान बिना नर भटके कोई मथुरा कोई काशी,
जैसे मृगा नाभि कस्तूरी बन बन फिरे उदासी !!

उपनिषदों में इस विषय पर खूब विचार किया गया है ! याज्ञवल्क्य और मैत्रेयि संवाद जो की वृहदारणक्य उपनिषद् का प्रमुख प्रसंग है उसमे इस विषय पर भलीभांति विचार किया गया है !

महर्षि याज्ञवल्क्य  की दो पत्नियां थीं। पहली पत्नी भारद्वाज ऋषि की पुत्री कात्यायनी और दूसरी मित्र ऋषि की पुत्री मैत्रेयी । एक दिन याज्ञवल्क्य  को लगा कि अब उन्हें गृहस्थ आश्रम छोडकर वानप्रस्थ के लिए चले जाना चाहिए। इसलिए उन्होंने दोनों पत्नियों के सामने अपनी संपत्ति को बराबर हिस्से में बांटने का प्रस्ताव रखा। कात्यायनी ने पति का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, पर मैत्रेयी बेहद शांत स्वभाव की थीं। अध्ययन, चिंतन और शास्त्रार्थ में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। वह जानती थीं कि धन-संपत्ति से आत्मज्ञान नहीं खरीदा जा सकता। इसलिए उन्होंने पति की संपत्ति लेने से इंकार करते हुए आत्मज्ञान की जिज्ञासा की ! फलस्वरूप महर्षि याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को आत्मज्ञान का उपदेश दिया और मैत्रेयी आध्यात्मिक धन को उपलब्ध हो गयी !

याज्ञवल्क्य ने अनेक दृष्टांतों तथा युक्तियों से आत्मवाद का निरूपण किया है। वे आत्मा के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की पारमार्थिक सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं। आत्मा के अतिरिक्त जो कुछ है, वह आर्त, अनृत और मृत्युपरक है तथा अज्ञान पर आधारित है।

वे आत्मा का स्वरुप वर्णन करते हुए गार्गी से कहते हैं –

स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥

‘हे गार्गी ! इसको ब्राह्मण अक्षर कहते हैं, वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न लम्बा है, न लाल है ( रंगहीन है ), बिना स्नेह के है, बिना छाया के है, बिना अँधेरे के है, वह वायु नहीं है, आकाश नहीं है, वह असंग है, रस से रहित है, गंध से रहित है, उसके नेत्र नहीं, श्रोत्र नहीं, वाणी नहीं, मन नहीं, उसके तेज नहीं, प्राण नहीं, मुख नहीं, परिमाण नहीं, उसके कुछ अन्दर नहीं, उसके कुछ बाहर नहीं, न वह कुछ भोगता है, न कोई उसको उपभोग करता है!’

उनके अनुसार

  • आत्मा सर्वान्तर है और इसके अतिरिक्त जो कुछ है, वह नाशवान है। आत्मा सत्यम् सत्यम् है। वह परम सत्य है। महान् और अद्वितीय है। वह अणु से भी अणुतर और महान् से भी महत्तर है।
  • आत्मा साक्षात् अपरोक्षात् ब्रह्मा है। यही सर्व है। यह सब का परायण है अर्थात् जो कुछ है, उसकी प्रतिष्ठा आत्मा में ही है। वह आत्मा में ही ओत-प्रोत है। वह स्वप्रतिष्ठित है, स्वयंज्योति है।
  • आत्मा ज्ञाता है। ज्ञाता का विपरिलोप कभी भी नहीं होता। घोर सुषुप्ति की अवस्था में भी रहता है। शरीर की मृत्यु के उपरान्त भी वह ज्ञाता रहता है। विद्या, कर्म और पूर्व प्रज्ञा मृतक मनुष्य की आत्मा के साथ मृत्यु के बाद भी रहते हैं।
  • ज्ञाता को ज्ञेय रूप में जाना नहीं जा सकता। ‘विज्ञातरामरे केन विजानीयात्’ ज्ञाता को कैसे जाना जा सकता है। याज्ञवल्क्य का यह मत आत्मा को अविषय सिद्ध करता है। जो आत्मा सबको जानती है, उसको किसके द्वारा जाना सकता है। अर्थात् किसी के द्वारा नहीं।
  • आत्मा सर्वत्र अविभक्त है। उसके अतिरिक्त कुछ अन्य (दूसरा) है ही नहीं, जिसको उससे विभक्त माना जाये।
  • जो आत्मा के अतिरिक्त दीख पड़ता है, वह वस्तुत: अन्य-सा है, वह अन्य या इतर नहीं है। बुद्धि पूर्वक देखने पर ज्ञात होता है कि दृश्यमान नानात्व का अस्तित्व है ही नहीं। जो इस नानात्व को देखता है, वह जन्म मरण के चक्र में पड़ा है, अर्थात् वह बंधन में है।

भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं –

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।13.23।।

इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है

वही साक्षी होनें से उपद्रष्ट और यथार्थ सम्मति देनेंवाला होनें से अनुमन्ता , सबका धारण – पोषण करनें वाला होनें से भर्ता , जीव रूपेण भोक्ता , ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होनें से महेश्वर एवं शुद्ध सच्चिदानंद होनें से परमात्मा (जो की उसका वास्तविक स्वरुप है ) कहा जाता है |

इसी आत्मा को जानना आत्मज्ञान कहलाता है!

पर इस आत्मा को जाने कैसे ?

यह भी अध्यात्म का ही विषय है ! इस पर विभिन्न महापुरुषों ने विविध प्रकार से समझाया है !

महर्षि पतंजलि ने योग का उपदेश दिया है ! उन्होंने बड़े ही सरल शब्दों में समझाया है –

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।

अर्थात – चित्त की वृतियों का रुक जाना ही योग है।

पर उससे होगा क्या ?

तदा द्रष्टु: स्वरूपे अवस्थानम !

अर्थात – तब द्रष्टा की अपने स्वरुप में अवस्थिति होती है ! बस हो गया काम

जब तक मन संकल्प विकल्प से परिपूर्ण है तब तक स्वयं का बोध नहीं होता ! और जब निर्विकल्प समाधि की दशा उपलब्ध होती है तब दृश्य विलीन हो जाते हैं और मात्र द्रष्टा ही बचता है !

पतंजलि कहते हैं कि भक्ति, ज्ञान, योग आदि सभी साधन मात्र है और स्वरुप बोध साध्य !

बुद्ध का भी यही उपदेश है ! केवल ध्यान

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता में बड़े ही सरल ढंग से आत्मकल्याण का मार्ग बताया है !

बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।।511।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।।52।।
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।53।।

अर्थात – विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकान्त और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारणशक्ति के द्वारा अन्तःकरण और इन्द्रियों कासंयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरन्तर ध्यानयोग के परायण रहने वाला, ममता रहित और शान्तियुक्त पुरुषसच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है।(51, 52, 53)

ॐ शांति: शांति: शांति:

4 Replies to “अध्यात्म क्या है ?”

  1. आप ने जो जानकारी दी वह हर जगह उपलब्ध तो है किंतु इतनी सरल भाषा मे नही । इस प्रथम संस्करण के लिए आप को ह्रदय से शुभकामनाएं ।

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